वो समेट रहा है अपने तंबू को अपने झंडे-डंडों को भगत सिंह की तस्वीरों को गांधी जी के जंतर को और साथ-साथ समेट रहा है पाश और दुष्यंत की किताबों को भी. उसने उतार लीं हैं कुछ हार चढ़ी तस्वीरें और उन्हें अपने झोले में रख लिया है. 1/2

Dec 10, 2021 · 3:15 PM UTC

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वो वापिस अपने घर लौट रहा है अपने साथियों के साथ और कुछ साथियों के बगैर अपनी मिट्टी में मिट्टी होने. मैं उससे एक सवाल पूछता हूँ कि क्यों नहीं टूटी तुम्हारी उम्मीद कैसे बचा रहा यह हौसला?
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वो कहता है.. हमारे तलुओं में कोई कील नहीं चुभती इन्हें कंकरों की आदत है. और रास्ते रोक लेने से हौसले नहीं टूटते हौसलों से अहंकार टूटते हैं